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Bhopal लाल बहादुर शास्त्री : श्रम, धीरज और देशप्रेम ही जिनकी पूंजी थी Lal Bahadur Shastri: Whose capital was hard work, patience and patriotism


Upgrade Jharkhand News.  हमारे देश ने एक से बढ़कर एक राजा, संत और देशसेवक देखे हैं। स्वतंत्र भारत के ऐसे ही एक सेवक थे लाल बहादुर शास्त्री, जिन्हें देश का 'लाल' कहा गया। देश के प्रधानमंत्री के रूप में वे केवल 18 महीने काम कर सके। 9 जून 1964 को उन्होंने पदभार संभाला, तब देश दोहरे संकट से गुजर रहा था - भीतर अन्न संकट और सीमा पर पाकिस्तान के हमले। तब उन्होंने कहा था, "कठिनाइयां हमारे सामने हैं, इनसे भागना कायरता होगी। मैं देश का कार्यभार एक सिपाही की तरह संभालूंगा।" उनका यही भाव अंत तक रहा। शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय में हुआ था। पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव साधारण कायस्थ परिवार के शिक्षक थे, बाद में राजस्व विभाग में लिपिक रहे। परिवार संपन्न नहीं था, पर संस्कार और सादगी में धनी था।


गरीबी में ही उनका बचपन बीता। कहा जाता है कि गांव आते-जाते समय गंगा पार करने के लिए कई बार पैसे न होने पर वे तैरकर नदी पार कर लेते थे। जो गरीबी में तपता है, वही खरा सोना बनता है, शास्त्री जी इसका प्रमाण थे। पढ़ाई के बाद उन्होंने काशी में अध्यापन किया। रोज छह-सात मील पैदल चलकर कॉलेज जाना उनके परिश्रम का प्रमाण था। यहीं से वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और कई बार जेल गए। 1927 में ललिता जी से उनका विवाह हुआ। ललिता जी धर्मपरायण महिला थीं और दहेज में चरखा और खादी का कपड़ा लाई थीं। शास्त्री जी का अधिकांश राजनीतिक जीवन इलाहाबाद में बीता। पंडित जवाहरलाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू के सान्निध्य में उन्होंने जिला कांग्रेस के महासचिव के रूप में 1930 से 1936 तक काम किया। एक साधारण कार्यकर्ता से चलकर प्रधानमंत्री के सर्वोच्च पद तक पहुंचना उनकी साधना का परिणाम था। किसी व्यक्ति की ऊंचाई इस बात से नहीं आंकी जाती कि वह कितना ऊंचा है, बल्कि इस बात से कि वह कहां से चला और कहां तक पहुंचा।


शारीरिक कद में छोटे शास्त्री जी का राजनीतिक कद बहुत ऊंचा था। वे सहज, सरल, मिलनसार और निराभिमानी थे। प्रधानमंत्री रहते हुए जब अन्न संकट आया तो भारत को अमेरिका से गेहूं मंगाना पड़ा। उन्होंने 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया, जो आज भी देश का संबल है। पाकिस्तान ने जब युद्ध थोपा तो शास्त्री जी ने दृढ़ नेतृत्व दिया। युद्ध में भारत बढ़त पर था, पर अंतरराष्ट्रीय दबाव में ताशकंद समझौता करना पड़ा। 10 जनवरी 1966 को समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ घंटे बाद, 11 जनवरी 1966 को तड़के ताशकंद में ही उनका निधन हो गया। शास्त्री जी के पास न अपना घर था, न जमीन-जायदाद।  प्रधानमंत्री बनने पर भी वे उसी बंगले में रहे जो सांसद के रूप में मिला था। उनका निजी कमरा 12x18 फीट का साधारण कमरा था, जिसमें एक तख्त, खादी की चादर, एक तिपाई, गांधी जी की तस्वीर और तिरुपति बालाजी की मूर्ति थी। एक बार दौरे से लौटने पर बेटी ने कमरे में एयर कंडीशनर लगवा दिया था, तो वे नाराज हुए और उसे तुरंत हटवा दिया। उनका कहना था कि जब करोड़ों देशवासियों के पास सिर छिपाने को घर और पेट भरने को अन्न नहीं, तो प्रधानमंत्री को यह सुख कैसे शोभा देता है।


अन्न संकट के दिनों में उन्होंने स्वयं सोमवार को उपवास किया और देश से भी अपील की। उन्होंने प्रधानमंत्री निवास में खुद हल चलाकर गेहूं बोया और नागरिकों को अन्न बचाने की प्रेरणा दी। सादा जीवन, श्रम, धीरज और देशप्रेम ही उनकी पूंजी थी। इसीलिए वे आज भी अमर हैं। अंजनी सक्सेना



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