Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

हरिनाम संकीर्तन झारखंड का एक महान धार्मिक संस्कृति है, Harinam Sankirtan is a great religious culture of Jharkhand


 7 मार्च को चैतन्य महाप्रभु की 537 वी जयंती पर बिशेष,,,

हाता। हरिनाम संकीर्तन क़ा संस्थापक व प्रचारक श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु है। जिसका जन्म आज से 537 वर्ष पूर्व पश्चिम बंगाल के नवद्वीप धाम में हुआ था। उनके पिताजी का नाम जगन्नाथ मिश्र और माताजी का नाम सची देवी था।उनका बचपन का नाम निमाई और गौरांग था।उनकी पत्नी का नाम लक्ष्मी प्रिया और विष्णुप्रिया थी।उन्होंने हरिनाम का प्रचार और प्रसार के लिए संन्यास धर्म ग्रहण किया था। उनका सन्यासी नाम चैतन्य महाप्रभु हैं। केशव भारती से उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण किया था। उन्होंने जात पात का गंडी तोड़कर सभो लोगों को हरिनाम दिया था,प्रेम,भक्ति और ज्ञान दिया था। उन्होंने महापापी जगाई और मधाई को उद्धार किया था।पश्चिम बंगाल,बिहार और उड़ीसा में खासकर उन्होंने हरिनाम का प्रचार किया था।

इसलिए हरिनाम संकीर्तन हमारे झारखंड राज्य का एक महान धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि यह एक महान संस्कृति भी है। प्रतिवर्ष फ्लॉगुन,चैत्र, बैशाख महीने में झारखंड के प्राय सभी गांव और शहर में हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया जाता है।यह हरिनाम संकीर्तन उत्सव के रूप में मनाया जाता है।हरि बासर अर्थात 12 घंटे,अष्टम प्रहर अर्थात 24 घंटे,सरोष प्रहर अर्थात 48 घंटे,चौबीस प्रहर अर्थात 72 घंटे अखंड हरिनाम संकीर्तन या तो राधा नाम अथवा हरेकृष्ण नाम किया जाता है।


इसके अलावे पंचम रात्रि,नवम रात्रि,चौद मदोल,डोल मदोल और हरिहाट तक हरिनाम संकीर्तन किया जाता है।इसके लिये एक कुंज का निर्माण किया जाता है। पहले फुश का कुंज निर्माण किया जाता था।अभी टेंट द्वारा कुंज अथवा हरिमंदिर में यह हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया जाता है। हरिनाम के पहले दिन अधिवास होता है, उसके बाद नाम भंग के पश्चात धुलट होता है। उसके बाद महाप्रभु को 108 मलसा भोग दिया जाता है।उसके बाद दधि भोग आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है। यह हरिनाम संकीर्तन में पुजारी के रूप में बैष्णब ही रहता हैं।  महाप्रभु को भक्ति आंदोलन का जनक कहा गया है उन्होंने आज से  537 साल पहले यह हरिनाम संकीर्तन का बाढ़ से भारत को नई राह और ऊर्जा दी थी जो आज भी प्रवाहमान है। चैतन्य चरितामृत में झारिखण्ड का उल्लेख है।झारिखंड  से  ही झारखंड का नाम पड़ा है। महाप्रभु झारखंड में भी हरिनाम संकीर्तन का प्रचार किया था इसलिये हरिनाम का यहाँ काफी प्रभाव पड़ा है।सचमुच हरिनाम संकीर्तन हमारे झारखंड  राज्य में केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि एक महान संस्कृति के रूप में जानी जाती है जो जात,धर्म वर्ण और समुदाय से परे है।इस कलियुग में हरिनाम ही मुक्ति का एकमात्र सरल उपाय है।हरिबोल।


No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU