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हरिनाम संकीर्तन झारखंड का एक महान धार्मिक संस्कृति है : सुनील कुमार दे, Harinam Sankirtan is a great religious culture of Jharkhand : Sunil Kumar De



हाता। हरिनाम संकीर्तन हमारे झारखंड राज्य का एक महान धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि यह एक महान संस्कृति भी है। प्रतिवर्ष फ्लॉगुन,चैत्र, बैशाख महीने में झारखंड के प्राय सभी गांव व शहर में हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया जाता है। यह हरिनाम संकीर्तन उत्सव के रूप में मनाया जाता है। हरि बासर 12 घंटे,अष्टम प्रहर अर्थात 24 घंटे,सरोष प्रहर अर्थात 48 घंटे,चौबीस प्रहर अर्थात 72 घंटे अखंड हरिनाम संकीर्तन या तो राधा नाम अथवा महामंत्र नाम किया जाता है। इसके अलावे पंचम रात्रि,नवम रात्रि,चौद मदोल, ढोल मदोल व हरिहाट तक हरिनाम संकीर्तन किया जाता है।इसके लिये एक कुंज का निर्माण किया जाता है।पहले फुश का कुंज निर्माण किया जाता था।अभी टेंट द्वारा कुंज अथवा हरिमंदिर में यह हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया जाता है।हरिनाम के पहले दिन अधिवास होता है, उसके बाद नाम भंग के पश्चात धुलत होता है। उसके बाद महाप्रभु को 108 मलसा भोग दिया जाता है। उसके बाद दधि भोग आरती व प्रसाद वितरण किया जाता है। यह हरिनाम संकीर्तन में पुजारी के रूप में बैष्णब ही रहता है।

हरिनाम संकीर्तन का प्रबर्तक चैतन्य महाप्रभु है।उनका जन्म पश्चिम बंगाल के नदिया जिला के नबदीप गांव में हुआ था। पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र तथा माता का नाम सची देवी थी।उनका बचपन का नाम निमाई था।शरीर गोरा होने के कारण गौरांग भी कहा जाता था।उनकी पत्नी का नाम विष्णुप्रिया थी। कृष्ण भक्ति प्रचार के दौरान अनेक पापी तापी को उद्धार किया था,जगाई मधाई उनमे से प्रमुख था। कलियुग में यज्ञ,तपश्या,से भगवत प्राप्ति और मुक्ति लाभ करना कठिन है इसलिये महाप्रभु ने हरिनाम संकीर्तन को मुक्ति का सरल उपाय बताया। उन्होंने हरिनाम को प्रचार प्रसार के लिये घर छोड़ा। मां और पत्नी को भी छोड़ा व केशव भारती से संन्यास धर्म ग्रहण किया ।निमाई का संन्यासी नाम चैतन्य महाप्रभु पड़ा।

महाप्रभु बंगाल,बिहार व ओड़िसा में जन जन तक हरिनाम संकीर्तन का प्रचार किया। महाप्रभु को भक्ति आंदोलन का जनक कहा जाता है। उन्होंने आज से करीब 550 साल पहले यह हरिनाम संकीर्तन का बाढ़ से भारत को नई राह और ऊर्जा दी थी जो आज भी प्रबाह मान है। महाप्रभु बिहार अर्थात वर्तमान झारखंड से भी गुजरे थे पूरी जाने के क्रम में।उस समय इस भूमि को झारखंड कहा जाता था। झारखंड से ही झारखंड नाम पड़ा है। महाप्रभु झारखंड में भी हरिनाम संकीर्तन का प्रचार किया था इसलिये हरिनाम का यहाँ काफी प्रभाव पड़ा है। सचमुच हरिनाम संकीर्तन हमारे झारखंड  राज्य में केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि एक महान संस्कृति के रूप में जानी जाती है जो जात,धर्म वर्ण और समुदाय से परे है।इस कलियुग में हरिनाम ही मुक्ति का एकमात्र सरल उपाय है।

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