Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Jamshedpur प्रखर देशभक्त सूफी अम्बा प्रसाद Fierce patriot Sufi Amba Prasad

 


  • लेखनी से रणभूमि तक संघर्ष की अद्भुत मिसाल
  • 30 सितंबर : पुण्यतिथि विशेष

Upgrade Jharkhand News.  भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े आंदोलनों, प्रसिद्ध नेताओं और युद्धभूमियों तक सीमित नहीं है। इस संघर्ष की नींव उन असंख्य देशभक्तों के त्याग, साहस और संघर्ष से मजबूत हुई, जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। सूफी अम्बा प्रसाद ऐसे ही विलक्षण क्रांतिकारी, पत्रकार और राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लेखनी को हथियार बनाया और बाद में विदेश की धरती पर भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। उनका जीवन निर्भीकता, बुद्धिमत्ता और अदम्य देशभक्ति का प्रेरक उदाहरण है। सूफी अम्बा प्रसाद का जन्म 1858 में मुरादाबाद में हुआ था। वे जन्म से ही दाहिने हाथ से वंचित थे। उनके व्यक्तित्व की खास बात यह थी कि वे अपनी शारीरिक कमी को कभी कमजोरी नहीं बनने देते थे। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि जब कोई उनके हाथ के संबंध में पूछता, तो वे हंसते हुए 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जोड़कर उत्तर देते थे। मुरादाबाद, बरेली और जालंधर में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की, लेकिन वकालत को पेशा बनाने के बजाय पत्रकारिता को अपना माध्यम चुना।उनकी लेखनी में अंग्रेजी शासन की नीतियों और अन्याय के विरुद्ध तीखा स्वर दिखाई देता था। उन्होंने समाचार-पत्रों और लेखों के माध्यम से जनता में राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया। मुरादाबाद में उन्होंने पत्रकारिता और मुद्रण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में उनका संबंध पंजाब के राष्ट्रवादी और किसान आंदोलनों से भी जुड़ा। वे सरदार अजीत सिंह सहित अनेक राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के संपर्क में आए और भारत माता सोसाइटी जैसी गतिविधियों से जुड़े।


उनकी निर्भीकता केवल लेखनी तक सीमित नहीं थी। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता और साहस को सामने लाता है। बताया जाता है कि भोपाल रियासत में अंग्रेज अधिकारी के अत्याचारों और भ्रष्टाचार की जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्होंने अपना रूप बदलकर उसके घर में काम तक किया। वहां से प्राप्त जानकारी के आधार पर अंग्रेज अधिकारी की गतिविधियों का पर्दाफाश हुआ। जब अधिकारी ने समाचार प्रकाशित कराने वाले व्यक्ति का पता बताने वाले को पुरस्कार देने की घोषणा की, तो सूफी अम्बा प्रसाद स्वयं उसके सामने पहुंच गए। यह प्रसंग उनकी निर्भीकता का परिचायक माना जाता है।1897 में ब्रिटिश शासन ने उनके विरुद्ध राजद्रोह से संबंधित मुकदमा चलाया। उन्होंने अपना पक्ष स्वयं रखा और जेल की सजा भुगती। जेल से बाहर आने के बाद भी उनका संघर्ष रुका नहीं। वे फिर राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। उनकी संपत्ति जब्त की गई और उन्हें दोबारा कारावास का सामना करना पड़ा। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत भी उनके बार-बार कारावास और ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों की पुष्टि करते हैं।


पंजाब में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने के दौरान वे सरदार अजीत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों के साथ जुड़े। ब्रिटिश दमन बढ़ने पर उन्हें नेपाल जाना पड़ा और इसके बाद वे फारस यानी वर्तमान ईरान पहुंच गए। वहां उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ स्थानीय स्वतंत्रता समर्थक शक्तियों के संपर्क में रहकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध गतिविधियां जारी रखीं। उन्होंने ‘आबे हयात’ जैसे प्रकाशन के माध्यम से अपने विचारों को आगे बढ़ाया। ईरान में उन्हें सम्मानपूर्वक ‘आका सूफी’ कहकर संबोधित किया जाता था।प्रथम विश्वयुद्ध के दौर में जब ब्रिटिश सेनाओं और उनके सहयोगियों का ईरान में प्रभाव बढ़ा, तब सूफी अम्बा प्रसाद शीराज क्षेत्र में स्वतंत्रता समर्थक शक्तियों के साथ संघर्ष में शामिल हुए। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार शीराज की लड़ाई के दौरान उन्होंने केवल अपने बाएं हाथ से हथियार संभालते हुए संघर्ष किया। अंततः वे गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें मृत्युदंड का आदेश दिया गया।उनकी मृत्यु की तिथि के संबंध में स्रोतों में मतभेद मिलता है। कुछ लोकप्रिय विवरण 30 सितंबर की तिथि प्रस्तुत करते हैं, जबकि भारत सरकार के ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के जिला अभिलेख और कुछ ऐतिहासिक स्रोत 21 जनवरी 1917 को शीराज में उनके निधन का उल्लेख करते हैं। उसी सरकारी अभिलेख में यह भी दर्ज है कि उनकी स्मृति में शीराज में सम्मान और स्मारक की परंपरा रही है।


सूफी अम्बा प्रसाद का जीवन यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों, पत्रकारिता, संगठन, साहस और त्याग से भी लड़ा जाता है। जन्म से एक हाथ न होने के बावजूद उन्होंने अपने जीवन में ऐसी सक्रियता दिखाई, जिसने शारीरिक सीमाओं को अप्रासंगिक बना दिया। भारत और ईरान की धरती पर उनके संघर्ष की स्मृति स्वतंत्रता आंदोलन के उस अंतरराष्ट्रीय आयाम को भी सामने लाती है, जिसमें भारतीय क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए विदेशों में भी प्रयास किए। ऐसे निर्भीक राष्ट्रवादी की स्मृति आज भी हमें यह प्रेरणा देती है कि अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय सत्य और स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होना ही सच्ची देशभक्ति है। सूफी अम्बा प्रसाद का संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की उस गौरवपूर्ण परंपरा का हिस्सा है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना इतिहास के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU